विभु मिश्रा
ग्रेटर नोएडा। घर का सपना दिखाकर बुकिंग शुरू करना, खरीदारों से करोड़ों रुपये लेना और फिर 15 साल बाद भी प्रोजेक्ट को अधूरा छोड़ देना। अंतरिक्ष गोल्फ लिंक परियोजना पर लगे आरोप अब सिर्फ देरी तक सीमित नहीं रह गए हैं। खरीददारों का कहना है कि यह मामला सुनियोजित वित्तीय लापरवाही, धन के कथित डायवर्जन और नियामक आदेशों की खुली अवहेलना का उदाहरण बन चुका है। रेरा के कई आदेश आने के बाद भी परियोजना पूरी नहीं हुई और सैकड़ों परिवार आज भी अपने घर के इंतजार में हैं।
2011 से शुरू हुई कहानी, आज भी इंतजार
खरीददारों के अनुसार, परियोजना की व्यावसायिक बुकिंग वर्ष 2011 में शुरू हुई थी। उस समय इसे एक प्रीमियम रिहायशी परियोजना के रूप में पेश किया गया। लेकिन 2026 तक भी पूरा प्रोजेक्ट तैयार नहीं हो सका। खरीदारों का आरोप है कि बिल्डर ने समयसीमा पर समयसीमा दी, लेकिन निर्माण गति कभी स्थिर नहीं रही। नतीजा यह हुआ कि वर्षों से लोगों की जमा पूंजी फंसी हुई है और उन्हें न घर मिला, न निवेश पर राहत।
सिर्फ दो टावर आबाद, बाकी अधर में
परियोजना के लेआउट के अनुसार जी और एफ टावर लगभग पूरी तरह आबाद हैं, जहां करीब 200 परिवार रह रहे हैं। इनमें भी अधिकांश किरायेदार बताए जा रहे हैं, क्योंकि सुविधाओं की कमी के चलते मालिक खुद रहने से बचते हैं। ए टावर में भी लगभग कब्जा दिया जा रहा है, लेकिन खरीददारों का आरोप है कि न्यूनतम सुविधाएं जैसे पार्किंग, लोअर ग्राउंड कॉमन एरिया और अन्य बुनियादी व्यवस्थाएं अब भी अधूरी हैं। बी, सी, डी और ई टावर आंशिक रूप से बने हैं, जबकि एच और जे टावर पर निर्माण शुरू तक नहीं हुआ। यानी 15 साल बाद भी परियोजना का बड़ा हिस्सा कागजों और वादों में अटका है।
44 रेरा मामले, 32 में फैसला
खरीददारों की एसोसिएशन के अनुसार, परियोजना से जुड़े 44 मामले रेरा में दाखिल किए गए। इनमें से 32 मामलों में फैसला खरीददारों के पक्ष में आ चुका है। लेकिन आरोप है कि बिल्डर ने आदेशों में तय शर्तें पूरी नहीं कीं। समयसीमा समाप्त होने के बाद अब आदेशों के क्रियान्वयन के लिए आगे एक्जीक्यूशन दायर किया जाएगा। खरीददारों का कहना है कि अगर रेरा के स्पष्ट आदेशों के बाद भी बिल्डर जवाबदेही से बचता रहे, तो यह व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करता है।
पैसा दूसरे प्रोजेक्ट में लगाने का आरोप
खरीददारों ने आरोप लगाया कि बिल्डर पर प्राधिकरण के भूमि शुल्क बकाया हैं और परियोजना का धन अन्य प्रोजेक्ट्स में लगाया गया। उनका दावा है कि यही कारण है कि निर्माण लगातार अटका रहा। यदि यह आरोप सही है, तो यह सिर्फ वित्तीय कुप्रबंधन नहीं बल्कि खरीददारों के हितों के साथ गंभीर खिलवाड़ है।
जिम्मेदारी से बच रहे प्रमोटर
इस संबंध में जब सोसायटी के केयरटेकर एमसी गुप्ता से बात की गई, तो उन्होंने जानकारी देने से मना करते हुए प्रमोटर्स से संपर्क करने को कहा। इसके बाद प्रमोटर राजीव गोयत से बात की गई, तो उन्होंने मामला दूसरे प्रमोटर राकेश यादव के पाले में डाल दिया। राकेश यादव से कई बार संपर्क का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। इस रवैये ने खरीददारों की उस शिकायत को और मजबूत किया है कि प्रबंधन जवाबदेही से बच रहा है।
घर नहीं, संघर्ष मिला
सैंकड़ों परिवार इस परियोजना से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं। कुछ अपने फ्लैट बचाने के लिए अधूरी सुविधाओं के बीच रह रहे हैं, तो ज्यादातर अब भी कब्जे की प्रतीक्षा में हैं। खरीददारों का कहना है कि उन्हें घर नहीं, बल्कि वर्षों लंबा संघर्ष मिला है।
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