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कुमुद मिश्रा
नई दिल्ली। सावन का पावन महीना आने ही वाला है और शिवभक्तों का उत्साह चरम पर है। इस मास में भगवान शिव की पूजा विशेष रूप से की जाती है। भक्त शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, फल व मिठाइयां चढ़ाकर भोलेनाथ को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। लेकिन एक सवाल अक्सर भक्तों के मन में उठता है— आख़िर शिवलिंग पर चढ़ाया गया प्रसाद क्यों नहीं खाया जाता? क्या यह भी प्रसाद नहीं हुआ? इसका जवाब कहीं और नहीं, शिव पुराण में मिलता है और वो जवाब जितना पौराणिक है, उतना ही रहस्यमयी भी।
चण्डेश्वर को समर्पित होता है शिवलिंग का भोग
शिव पुराण में वर्णन है कि शिवलिंग पर जो भी भोग चढ़ाया जाता है, वह सीधे चण्डेश्वर को अर्पित माना जाता है। चण्डेश्वर, भगवान शिव के एक विशेष गण हैं, जिनका जन्म स्वयं शिवजी के मुख से हुआ था। उन्हें भूत-प्रेतों और गणों का स्वामी माना गया है। शिव पुराण के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति शिवलिंग पर चढ़ा भोग खा लेता है, तो वह चण्डेश्वर के स्थान को प्राप्त करता है, जिसका सीधा अर्थ है— भूत-प्रेतों के प्रभाव में आना या जीवन में नकारात्मकता का प्रवेश।
शिव पुराण का श्लोक देता है चेतावनी
शिव पुराण में एक श्लोक में कहा गया है—
"लिंगस्योपरि दत्तं नैवेद्यं भूतभावनम्।
तद् भुक्त्वा चण्डिकेशस्य, गणस्य च भवेत् पदम्।"
इसका अर्थ है कि शिवलिंग पर अर्पित नैवेद्य (भोग) भूतों के संरक्षक को समर्पित होता है और उसे ग्रहण करने से व्यक्ति चण्डेश्वर की स्थिति में पहुंच सकता है। यानी उसे सांसारिक, मानसिक या आत्मिक तौर पर हानि हो सकती है। यही कारण है कि शिवलिंग पर चढ़ा भोग कभी नहीं खाया जाता, बल्कि उसे जल में प्रवाहित कर देना या गौ सेवा में अर्पित करना श्रेयस्कर माना गया है।
कब खा सकते हैं शिवलिंग पर चढ़ा प्रसाद?
हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में शिवलिंग पर चढ़ा भोग प्रसाद के रूप में स्वीकार्य हो सकता है। उदाहरण के लिए, धातु (तांबा, चांदी, सोना) या पारद (पारा) से बने शिवलिंग पर अर्पित भोग को खाया जा सकता है। ऐसे शिवलिंग पर चण्डेश्वर का प्रभाव नहीं माना जाता। लेकिन पत्थर, मिट्टी या चीनी मिट्टी से बने शिवलिंग पर चढ़ा प्रसाद कभी नहीं खाना चाहिए। वहीं, शिव की प्रतिमा या मूर्ति पर चढ़ा भोग पूर्ण रूप से सुरक्षित और पुण्यदायी होता है।
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स्थान:
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टिप्पणियाँ

Very nice information
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