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गाजियाबाद। सुप्रीम कोर्ट द्वारा UGC के 2026 इक्विटी रेगुलेशंस पर अस्थायी रोक लगाए जाने के बाद भी सवर्ण समाज में भाजपा सरकार के खिलाफ नाराज़गी कम होती नहीं दिख रही है। हैरानी की बात यह है कि विरोध सिर्फ विपक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि भाजपा से जुड़े और लंबे समय से समर्थक रहे सवर्ण वर्ग के लोग भी खुलकर सवाल उठा रहे हैं। इसे भाजपा के लिए एक साफ राजनीतिक चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने UGC के 2026 नियमों को फिलहाल लागू न करने का आदेश देते हुए इन्हें प्रथम दृष्टया अस्पष्ट और दुरुपयोग की आशंका वाला बताया है। कोर्ट ने कहा कि नियमों की दोबारा समीक्षा के लिए एक छोटी समिति बने, जिसमें वरिष्ठ और प्रतिष्ठित विधिवेत्ता शामिल हों। कोर्ट ने यह भी पूछा कि जब 2012 के नियम ज्यादा समावेशी थे, तो 2026 में पीछे क्यों जाया जा रहा है।
भाजपा नेताओं की चुप्पी
सवर्ण समाज में सबसे ज्यादा नाराज़गी इस बात को लेकर है कि भाजपा का कोई भी बड़ा सवर्ण नेता खुलकर UGC के इन नियमों का विरोध करते नहीं दिखा। उल्टा, कई नेता बचाव की मुद्रा में नजर आए। पार्टी से जुड़े लोगों का कहना है कि यह कानून सोची-समझी रणनीति के तहत पास कराया गया और सवर्ण समाज को अपनी बात रखने का कोई मौका नहीं दिया गया।
सत्ता पक्ष की जवाबदेही
राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टी समर्थकों का कहना है कि जब भाजपा के 16 सांसद इस कानून से जुड़ी प्रक्रिया का हिस्सा थे, तो जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। यदि सत्ता पक्ष के सांसद चाहते, तो स्टैंडिंग कमेटी में इस पर सवाल उठ सकते थे। संख्या बल सत्ता पक्ष के पास था, फिर भी विरोध नहीं हुआ।
समर्थक भी नाराज़
Fortune Residency निवासी बिजेंद्र बिद्रोही का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने रोक अस्थायी लगाई है, लेकिन सरकार की मंशा पर सवाल बने हुए हैं। वहीं RNEx से जुड़े राजन त्रिपाठी ने कहा कि अगर सरकार सच में चाहती है कि संशोधन का रास्ता खुले, तो उसे सुप्रीम कोर्ट में मजबूत पैरवी करनी होगी और समाज की नाराज़गी को भी गंभीरता से लेना होगा।
राजनीतिक संदेश साफ
कुछ समर्थकों का मानना है कि भाजपा सवर्णों को “फिक्स्ड वोट बैंक” मानकर चल रही है और अन्य वर्गों के ध्रुवीकरण के लिए इस तरह के कानून लाए जा रहे हैं। यही सोच आगे चलकर पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।
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