गाजियाबाद। उत्तर प्रदेश में बढ़ते बंदर आतंक पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ कहा कि सरकार केवल याचिकाकर्ताओं के सुझावों को खारिज करने की औपचारिकता न निभाए, बल्कि उन्हें गंभीरता से परखे और अमल योग्य उपायों पर ठोस कार्रवाई करे। मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश 34 बिंदुओं वाले एक्शन प्लान को लेकर कोर्ट ने सरकार को विस्तृत समीक्षा के निर्देश दिए हैं। यह जानकारी अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ ने दी।
सरकार की एसओपी पर सवाल
मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि राज्य सरकार द्वारा पेश की गई स्पेशल ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) बंदर आतंक की जमीनी समस्या को पूरी तरह संबोधित नहीं करती। कोर्ट ने माना कि प्रदेश के कई जिलों में बंदरों के हमले, लोगों के घायल होने और आम जनजीवन प्रभावित होने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन सरकार की मौजूदा योजना में जरूरी पहलुओं की कमी दिखाई देती है।
34 सूत्रीय प्लान पेश
अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ ने बताया कि याचिकाकर्ता विनीत शर्मा और प्राजक्ता सिंघल की ओर से कोर्ट में 34 बिंदुओं वाला व्यापक एक्शन प्लान दाखिल किया गया है। इसमें प्रदेशभर में सामने आ रहे मानव-बंदर संघर्ष के लगभग हर पैटर्न को शामिल करते हुए अलग-अलग समाधान सुझाए गए हैं। कोर्ट को बताया गया कि यह योजना केवल कागजी सुझाव नहीं, बल्कि जमीनी हालात को ध्यान में रखकर तैयार की गई है और समय के साथ इसमें और सुधार भी संभव है।
सरकार को सख्त निर्देश
हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को निर्देश दिया है कि गठित समिति के माध्यम से याचिकाकर्ताओं के एक्शन प्लान का विस्तार से परीक्षण किया जाए। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार केवल हर सुझाव को नकारने की मानसिकता से बाहर निकले और व्यावहारिक समाधान तलाशे। कोर्ट ने राज्य सरकार से 16 जुलाई 2026 तक विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। प्रदेश में लगातार बढ़ रहे बंदर आतंक के बीच हाईकोर्ट की यह टिप्पणी सरकार पर दबाव बढ़ाने वाली मानी जा रही है।
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