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125 साल पुरानी सुल्लामल रामलीला कमेटी में चुनावी घमासान तेज, अजय बंसल फिर चुने गए निर्विरोध अध्यक्ष, 6 पदों पर आर-पार की जंग
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गाजियाबाद। महानगर की सबसे प्रतिष्ठित और करीब सवा सौ साल पुरानी 'सुल्लामल रामलीला कमेटी' के चुनाव को लेकर शहर का सियासी और सामाजिक पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। शहर के रसूखदार व्यापारियों, राजनेताओं और समाजसेवियों के बीच इस चुनावी महासंग्राम को लेकर सुगबुगाहट तेज है। हालांकि, कमेटी के सबसे बड़े पद यानी अध्यक्ष पद पर अजय कुमार बंसल ने निर्विरोध बाजी मारकर विरोधियों को शांत कर दिया है, लेकिन असली सस्पेंस अभी बाकी है। बाकी के छह महत्वपूर्ण पदों पर दावेदारों ने पूरी ताकत झोंक दी है, जिससे मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है।
अध्यक्ष पद पर बंसल फिर काबिज
चुनावी प्रक्रिया के शुरुआती दौर में उस वक्त बड़ा मोड़ आया जब अध्यक्ष पद के लिए केवल अजय कुमार बंसल का ही इकलौता नामांकन सामने आया। किसी अन्य दिग्गज के मैदान में न उतरने के कारण उन्हें सर्वसम्मति से निर्विरोध अध्यक्ष चुन लिया गया। बंसल के निर्विरोध निर्वाचन से संगठन के भीतर एकजुटता का संदेश तो गया है, लेकिन इसने बाकी पदों पर होने वाली चुनावी जंग को और ज्यादा हवा दे दी है।
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| बीते साल की कमेटी |
इन 6 अहम पदों पर होगी सीधी टक्कर
कमेटी की कमान संभालने के लिए बाकी बचे पदों पर सीधा और कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। मैदान में उतरे सूरमाओं की स्थिति कुछ इस तरह है:
उपाध्यक्ष: संजीव मित्तल और आशीष कृष्ण के बीच कांटे की टक्कर है।
कनिष्ठ उपाध्यक्ष: अनिल चौधरी और विनय सिंघल आमने-सामने डटे हैं।
महामंत्री: इस रसूखदार पद के लिए नरेश अग्रवाल और मिथलेश कुमार गुप्ता ने ताल ठोंकी है।
मंत्री: प्रदीप मित्तल और कुलदीप कुमार मित्तल के बीच सीधी भिड़ंत है।
कोषाध्यक्ष: सुधीर गोयल और सुमित गर्ग अपनी साख बचाने के लिए मैदान में हैं।
लेखा परीक्षक: रविंद्र मित्तल और अनिल कुमार अग्रवाल के बीच सीधा मुकाबला है।
शहर में प्रतिष्ठा की लड़ाई
सुल्लामल रामलीला कमेटी का इतिहास गाजियाबाद के वजूद और इसकी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा है। दशकों से होने वाले यहां के भव्य रामलीला और दशहरा महोत्सव पूरे एनसीआर में मशहूर हैं। यही वजह है कि इस चुनाव पर जिले के सांसदों, विधायकों और बड़े उद्योगपतियों की निगाहें टिकी हुई हैं। इसे महज एक संस्था का चुनाव न मानकर, शहर के बड़े परिवारों और व्यापारिक गुटों के बीच सामाजिक प्रतिष्ठा की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है।
28 जून को होगा 'महासंग्राम' का फैसला
अब सभी की नजरें आने वाली 28 जून को होने वाले मतदान पर टिक गई हैं। इसी दिन सभी छह पदों के लिए वोट डाले जाएंगे और मतदान के तुरंत बाद आने वाले नतीजे यह तय करेंगे कि गाजियाबाद की इस ऐतिहासिक धरोहर की बागडोर अगले कार्यकाल के लिए किस धड़े के हाथों में सुरक्षित रहेगी। पाले खिंच चुके हैं और हर खेमा अपने-अपने समीकरण साधने में व्यस्त है।
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Ajay Kumar Bansal
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