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गाजियाबाद। शालीमार गार्डन स्थित ट्रू मीडिया स्टूडियो में देवप्रभा प्रकाशन ने महाकवि डॉ. कुँअर बेचैन की जयंती पर एक यादगार कविता संगोष्ठी का आयोजन किया। इस अवसर पर डेढ़ दर्जन से ज़्यादा कवियों ने डॉ. कुँअर बेचैन से जुड़े अपने संस्मरण साझा किए और अपनी कविताओं से शाम को संगीतमय बना दिया।
कवियों का सम्मान और काव्य पाठ
गजरौला से पधारीं सुप्रसिद्ध महाकवयित्री डॉ. मधु चतुर्वेदी ने संगोष्ठी की अध्यक्षता की, जबकि मशहूर शायर कृष्ण बिहारी नूर के शागिर्द अरविंद असर मुख्य अतिथि रहे। जाने-माने कवि अनिल मीत, बीएल बत्रा अमित्र, और वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश प्रजापति विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। सभी रचनाकारों को डॉ. कुँअर बेचैन के चित्र से सुसज्जित स्मृति चिह्न, मोतियों की माला और अंगवस्त्र भेंटकर सम्मानित किया गया।
डॉ. मधु चतुर्वेदी ने अपने काव्य पाठ में दोहे, मुक्तक, गजलें और गीत प्रस्तुत किए। उनकी पंक्तियां- 'उम्रभर हमने ऐसे कसाले जिये, तम निगलते रहे पर उजाले दिये, प्यास में अश्रुओं का रसायन मिला, तृप्ति के घट तुम्हारे हवाले किये।' विशेष रूप से सराही गईं।
शायर अरविंद असर ने अपनी भावुकता व्यक्त करते हुए पढ़ा- 'मुझको अश्कों के समुन्दर से भिगोने लायक, कोई कांधा तो मिले फूट के रोने लायक, मुझको हर वक्त लगी रहती है तेरी चिन्ता, एक तू ही तो मेरे पास है खोने लायक।'
कविवर अनिल मीत ने सुनाया- 'चुपके-चुपके सब कुछ सहना ठीक नहीं, मन ही मन में कुढ़ते रहना ठीक नहीं, दुनिया को समझा तो हमने यह जाना, सीधी-सच्ची बातें कहना ठीक नहीं।'
प्रसिद्ध दोहाकार डॉ. मनोज कामदेव का चर्चित दोहा- 'सूरज ने पाती लिखी, देख रात का रूप, खिड़की खुलते ही गिरी एक लिफाफा धूप।' खूब पसंद किया गया।
कवि अजीत श्रीवास्तव ने अपने भाव कुछ यूं रखे- 'उनको आते देख हम घबरा गये, थम गई धड़कन कदम थर्रा गये, चाहता था दूर जिनसे ही रहूं, पास मेरे वो कहां से आ गये।'
शैलजा सक्सेना शैली ने डॉ. कुँअर बेचैन का कालजयी गीत '-नदी बोली समुन्दर से मैं तेरे पास आई हूं,' सुनाया और अपनी कविताओं से वातावरण को नई रोशनी दी।
कवि जगदीश मीणा ने बचपन पर आधारित मार्मिक गीत सुनाकर सभी को भावुक कर दिया- 'मुझे याद आता है बचपन का सावन, मुसीबत की काली घटाओं की आवन।'
डॉ. सुरुचि सैनी ने अपनी मीठी आवाज़ में सुनाया- 'कोयल कुहू कुहू से हर ड्योढ़ी गुंजाई है, मइया तेरे आंगन में फिर से बिटिया आई है।'
सुविख्यात कवयित्री शोभा सचान ने अपनी बात कुछ यूं कही- 'कविवर कलम जो अपने हाथों में हैं संभाले, दुनिया को मिल रहे हैं साहित्य के उजाले।'
कवयित्री ज्योति राठौर ने पढ़ा- 'प्यार कर जिन्दगी मुस्कुरा ले जरा, गीत इकरार के गुनगुना ले जरा, तुझपे पड़ने लगे हर किसी की नजर, अपने किरदार को यूं सजा ले जरा।'
'कुँअर बेचैन हम हैं' - संयोजक डॉ. चेतन आनंद
कविता संगोष्ठी के संयोजक डॉ. चेतन आनंद ने डॉ. कुँअर बेचैन को समर्पित एक गीत पढ़ा, जिसमें उनकी उपस्थिति महसूस की जा सकती थी। उन्होंने कहा- 'कौन कहता है हमें वे छोड़कर अब जा चुके हैं, ध्यान से देखो तो लगता है कुंअर बेचैन हम हैं।'
अन्य कवियों का योगदान और समापन
कविता संगोष्ठी में प्रसिद्ध कवयित्री डॉ. तूलिका सेठ, डॉ. नीरजा चतुर्वेदी, सीमा सागर शर्मा, ओम प्रकाश प्रजापति आदि ने भी अपनी कविताओं से समां बांधा। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. चेतन आनंद ने किया। डॉ. कुँअर बेचैन की कविताओं के वाचन के साथ ही इस भावपूर्ण कविता संगोष्ठी का समापन किया गया।
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