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| एसीपी प्रियाश्री पाल |
विभु मिश्रा
गाजियाबाद। पुलिस की वर्दी अक्सर सख्त अनुशासन और कठोरता का प्रतीक मानी जाती है, लेकिन इसी वर्दी के भीतर एक ऐसा संवेदनशील मन भी होता है जो दूसरों की पीड़ा देखकर पसीज जाता है। एसीपी वेव सिटी प्रियाश्री पाल एक ऐसी ही पुलिस अधिकारी हैं, जिनके लिए कानून व्यवस्था सिर्फ ड्यूटी नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का एक जरिया है। वाराणसी से लेकर उनके वर्तमान सफर तक, कई ऐसे मौके आए जब उनकी आंखों की नमी ने यह साबित कर दिया कि खाकी के पीछे एक ममतामयी मां और संवेदनशील इंसान धड़कता है।
पैर पर नन्हा बच्चा और ममता
वाराणसी में तैनाती के दौरान एक हृदय विदारक घटना ने प्रियाश्री पाल को झकझोर कर रख दिया। एक घरेलू हिंसा की शिकार महिला न्याय की गुहार लगाने आई और बेबसी में उसने अपने नवजात बच्चे को एसीपी के पैरों में रख दिया। उस दृश्य को याद कर वे आज भी भावुक हो जाती हैं। उन्होंने तुरंत बच्चे को गोद में उठाकर सीने से लगा लिया। उन्होंने न केवल आरोपी पति को सख्त हिदायत देकर सुधारा, बल्कि उस महिला को संबल भी दिया। यही कारण है कि वे आज हर मंच से बेटियों को शिक्षित होने और आत्मनिर्भर बनने की सीख देती हैं।
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| प्रतीकात्मक फोटो |
लापता बेटी की बरामदगी और आंसू
कोतवाली में तैनाती के दौरान एक मां अपनी बेटी के लिए सात महीनों से भटक रही थी। प्रियाश्री पाल ने मामले की गंभीरता को समझा और जांच अधिकारी को सख्त निर्देश दिए। नतीजा यह हुआ कि जो बेटी महीनों से लापता थी, वह महज तीन दिन में बरामद हो गई। जब वह मां अपनी बेटी के साथ एसीपी ऑफिस पहुंची, तो उनकी आंखों से बहते खुशी के आंसू प्रियाश्री के लिए किसी भी मेडल से बड़े थे। वह पल एक पुलिस अधिकारी की कर्तव्यनिष्ठा और एक मां की दुआओं के मिलन का था।
वर्दी में छिपी मानवीय संवेदनाएं
एसीपी प्रियाश्री पाल का मानना है कि पुलिस का काम सिर्फ अपराधी को दंड देना नहीं, बल्कि पीड़ित के घावों पर मरहम लगाना भी है। उनके कार्य करने की शैली में कानून की सख्ती और दिल की कोमलता का अद्भुत संतुलन दिखता है। वे मानती हैं कि जब तक समाज की अंतिम पंक्ति में खड़ी महिला सुरक्षित महसूस नहीं करती, तब तक पुलिसिंग अधूरी है। उनकी ये कहानियां दर्शाती हैं कि वर्दी पहनने वाला हर शख्स पत्थर का नहीं होता, बल्कि उसमें भी एक कोमल हृदय निवास करता है।
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India
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