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गाजियाबाद। कुर्सी की राजनीति से हमेशा दूरी रखने वाले, लेकिन जनसंघर्ष की लड़ाई में सबसे आगे रहने वाले समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र की पुण्यतिथि 22 जनवरी को देशभर में मनाई जा रही है। लोग उन्हें सिर्फ नेता नहीं, बल्कि साफ सोच, ईमानदार सियासत और जमीन से जुड़े संघर्ष का प्रतीक मानते हैं। यही वजह थी कि उन्हें “छोटे लोहिया” कहा गया।
लोहिया से मिली वैचारिक ताकत
5 अगस्त 1933 को जन्मे जनेश्वर मिश्र डॉ. राममनोहर लोहिया की विचारधारा में ढले नेता थे। गैरबराबरी, शोषण और सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ लड़ना उनकी राजनीति की रीढ़ रही। वे मानते थे कि राजनीति का मकसद कुर्सी हासिल करना नहीं, बल्कि समाज को बराबरी की दिशा में आगे ले जाना है। इसी साफ सोच ने उन्हें समाजवादी आंदोलन का मजबूत स्तंभ बनाया।
छह प्रधानमंत्रियों के भरोसेमंद मंत्री
जनेश्वर मिश्र मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर, एच.डी. देवगौड़ा और आई.के. गुजराल की सरकारों में केंद्रीय मंत्री रहे। पेट्रोलियम, जल संसाधन, रसायन एवं उर्वरक, ऊर्जा, परिवहन, संचार और रेल जैसे अहम मंत्रालय उन्होंने संभाले। 1990–91 में चंद्रशेखर सरकार में वे रेल मंत्री भी रहे। सत्ता के शीर्ष पदों पर रहते हुए भी उनका जीवन आम आदमी जैसा ही रहा।
चुनावी मैदान की मजबूत पकड़
1969 में फुलपुर लोकसभा सीट से तत्कालीन केंद्रीय मंत्री के.डी. मालवीय को हराकर उन्होंने संसद में एंट्री की। यह जीत उस दौर की राजनीति में बड़ा उलटफेर मानी गई। 1977 में प्रयागराज से वी.पी. सिंह को करीब 90 हजार वोटों से हराया। वे तीन बार सांसद बने और छठी व नौवीं लोकसभा के सदस्य रहे। उनकी राजनीति हमेशा संगठन और कार्यकर्ताओं के भरोसे आगे बढ़ी।
अखिलेश को आगे लाने की सोच
1999 के कन्नौज लोकसभा उपचुनाव के समय समाजवादी पार्टी के भीतर इस बात पर मंथन चल रहा था कि नई पीढ़ी को नेतृत्व में लाया जाए या नहीं। मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव तब राजनीति में नए थे और सीधे चुनाव लड़ाने को लेकर पार्टी के अंदर भी सवाल उठ रहे थे। जनेश्वर मिश्र ने खुलकर इसका समर्थन किया। उनका तर्क था कि अगर कोई नेता संघर्ष के रास्ते से संगठन में तपकर आगे आता है, जनता के बीच मेहनत करता है और विचारधारा को समझता है, तो उसे सिर्फ “नेताजी का बेटा” कहकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए।
इसी संदर्भ में उन्होंने कहा था कि “यह सत्ता का नहीं, संघर्ष का परिवारवाद है।” उनका मतलब साफ था कि सत्ता की विरासत गलत है, लेकिन संघर्ष की विरासत अगर आगे बढ़े तो आंदोलन मजबूत होता है। उनके इसी हस्तक्षेप के बाद अखिलेश यादव को कन्नौज से मैदान में उतारा गया और यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा की मजबूत शुरुआत हुई।
सादगी बनी असली पहचान
सात बार केंद्रीय मंत्री रहने के बावजूद न उनके पास निजी गाड़ी थी और न कोई सरकारी ठाठ-बाट। शुगर की बीमारी के बावजूद जब कार्यकर्ता मिठाई लाते, तो उनका दिल रखने के लिए थोड़ा जरूर खाते थे। हंसते हुए कहते की इतने मन से लाए हो तो थोड़ा तो खाना ही पड़ेगा। यही छोटी बातें उन्हें आम लोगों के करीब रखती थीं।
संघर्ष की अमिट विरासत
22 जनवरी 2010 को प्रयागराज के तेज बहादुर सप्रू अस्पताल में हृदयाघात से उनका निधन हुआ। अंतिम समय में वे समाजवादी पार्टी के उपाध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य थे। बिना दिखावे की राजनीति, साफ छवि, वैचारिक ईमानदारी और संगठन की मजबूत पकड़। यही जनेश्वर मिश्र की असली विरासत है, जिसे कार्यकर्ता आज भी याद करते हैं।
गाजियाबाद से पारिवारिक रिश्ता
जनेश्वर मिश्र की बड़ी बेटी शांति मिश्र का विवाह राम बच्चन मिश्र से हुआ था, जो उत्तर प्रदेश सरकार में संयुक्त आयुक्त (सेल्स टैक्स) रहे। उनका परिवार वर्तमान में राजनगर, गाजियाबाद में निवास करता है। परिवार में चार पुत्र और दो पुत्रियां हैं।
जनेश्वर मिश्र की नातिन मानसी का विवाह गाजियाबाद के इंदिरापुरम निवासी मोहित द्विवेदी से हुआ है और दंपति का एक पुत्र है। मोहित द्विवेदी के पिता निर्मल द्विवेदी इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रहे, जिनका निधन मार्च 2012 में हुआ था। उनकी माता पद्मा द्विवेदी हैं। छोटे भाई साई गिरधर द्विवेदी इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिवक्ता हैं, जबकि सबसे छोटी बहन अंजुल द्विवेदी सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं और कई अहम कानूनी जिम्मेदारियों से जुड़ी हैं।
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