विभु मिश्रा
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के आतंक पर कड़ा रुख अपनाते हुए सरकारों और डॉग लवर्स को फटकार लगाई है। कोर्ट की इन टिप्पणियों के बाद कानूनी विशेषज्ञों और आम जनता के बीच सुरक्षा और जवाबदेही को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि अब आवारा कुत्तों के प्रबंधन में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों और नियमों की अनदेखी करने वाले फीडर्स पर कानून का शिकंजा कसेगा।
प्रभावी प्रबंधन और मजबूत कानूनी मिसाल
कानूनी विशेषज्ञ मोहित कुमार द्विवेदी के अनुसार, यह फैसला सार्वजनिक सुरक्षा को प्राथमिकता देता है और राज्यों व फीडर्स की जिम्मेदारी तय करता है। यह एक मजबूत कानूनी मिसाल है कि मानव सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। अधिकारियों को अब एबीसी नियमों के तहत नसबंदी और टीकाकरण कार्यक्रम को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाना ही होगा।
संवैधानिक मर्यादा और जीवन का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता अंजुल द्विवेदी के अनुसार, कोर्ट का रुख संवैधानिक रूप से उचित है। अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में भयमुक्त होकर सार्वजनिक स्थानों पर चलने का अधिकार भी शामिल है। पशु कल्याण महत्वपूर्ण है, लेकिन वह मानव सुरक्षा से ऊपर नहीं हो सकता। राज्य की जवाबदेही पर कोर्ट का जोर संतुलित है, न कि न्यायिक अतिरेक।
फीडर्स और निकायों पर जिम्मेदारी
इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता साईं गिरिधर का कहना है कि अब जवाबदेही तय की जाएगी। यदि कुत्ता काटता है, तो नगर निकायों के साथ-साथ नियमित भोजन कराने वालों पर भी मुआवजे की कानूनी जिम्मेदारी आ सकती है। इससे स्थानीय निकायों पर नसबंदी और नियंत्रण व्यवस्था को सख्ती से लागू करने का दबाव बढ़ेगा, क्योंकि केवल पशु-प्रेम पर्याप्त नहीं है।
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