नगर निगम का अनोखा खेल: अपने 50 लाख के गोबर पेंट प्लांट को खुद ही नकारा, विदेशी महंगे पेंट को दी तरजीह

विभु मिश्रा 
गाजियाबाद। नगर निगम ने पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी उत्पाद को बढ़ावा देने के लिए 50 लाख रुपए खर्च करके गोबर पेंट का प्लांट लगाया, लेकिन खुद ही अब इसके इस्तेमाल से कतरा रहा है। निगम के नवयुग मार्किट स्थित मुख्यालय में हो रही पुताई के लिए जापानी कंपनी समेत निजी ब्रांड के पेंट खरीदे जा रहे हैं। जबकि उसका अपना सस्ता और टिकाऊ गोबर पेंट प्लांट बेकार पड़ा है। इससे निगम की मंशा और प्रोजेक्ट की सफलता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

प्रचार किया फिर बनाई दूरी

बता दें कि नगर निगम ने नंदी पार्क गौशाला में सितंबर माह में इस गोबर पेंट प्लांट का उद्घाटन किया था। जिसका विभाग द्वारा खूब प्रचार भी किया गया। शहर में जगह-जगह यूनिपोल और स्वदेशी मेलों में स्टाल लगाकर लोगों को इसके इस्तेमाल करें प्रेरित किया। लेकिन हैरत की बात ये है कि प्लांट शुरू होने के चार महीने के बाद भी निगम ने अपने किसी भी काम के लिए इस प्लांट से एक लीटर पेंट भी नहीं खरीदा है। वर्तमान में मुख्यालय के बेसमेंट में काम चल रहा है। लेकिन यहां भी गोबर पेंट की जगह दीवारों पर जापानी और निजी महंगे ब्रांडों के पेंट की चमक दिख रही है।

चार महीने में बिका सिर्फ 25 लीटर पेंट

इस प्रोजेक्ट के तहत महिलाओं को रोजगार देने का भी दावा किया गया था लेकिन प्लांट पर एक भी महिला कर्मचारी फिलहाल काम करती नजर नहीं आ रही है। प्लांट के संचालक सीताराम शर्मा और मैनेजर अभिषेक त्रिपाठी के मुताबिक इस प्लांट की क्षमता दो हजार लियर पेंट प्रतिदिन बनाने की क्षमता है लेकिन पिछले चार महीने में सिर्फ 20 से 25 लीटर पेंट ही बिक पाया है। इस कारण फिलहाल प्रोजेक्ट पर काम नहीं किया जा था है। मैनेजर अभिषेक त्रिपाठी का कहना है कि निगम कि ओर से अभी तक कोई भी आर्डर नहीं मिला है, जबकि वह लगातार पत्र भेज कर निगम अधिकारियों से अपने प्रोजेक्टों में इस उत्पाद के इस्तेमाल के लिए निवेदन कर रहे है।

संचालकों में निगम के रवैये से नाराजगी

प्लांट संचालक सीताराम शर्मा निगम अधिकारियों के इस रवैये से काफी नाराजगी है। उनका कहना है कि वो निगम अधिकारियों के सामने मुख्यालय के काम में गोबर पेंट का इस्तेमाल न करने पर  नाराजगी जता चुके हैं लेकिन उन्हें कोई सकारात्मक जवाब या आश्वासन नहीं मिला है। इसे में सवाल उठता है कि जब निगम खुद ही अपने इस पेंट का इस्तेमाल नहीं करेगा तो आम जनता को कैसे विश्वास दिलाएगा?

कागजों में सिमटी खूबियाँ

नगर निगम ने गोबर पेंट की जिन खूबियों का जोश शोर से प्रचार किया था, वो सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गईं हैं। निगम के दावे के मुताबिक यह पेंट सामान्य पेंट से ज्यादा टिकाऊ है, छत पर लगाने से कमरे को ठंडा रखता है। देखने में बेहतर लगता है पूरी तरह इको फ्रेंडली और एंटी बैक्टीरियल है। इसके अलावा डिस्टेंपर में 30 प्रतिशत और इमल्शन में 20 प्रतिशत गोबर मिलाकर यह पेंट तैयार किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसकी कीमत सिर्फ 125 रुपए प्रति लीटर है जबकि निजी कंपनियों के पेंट तीन सौ रुपये से लेकर पांच सौ रुपये प्रति लीटर हैं। उसके बावजूद निगम द्वारा अपने ही काम में अपने ही सस्ते, स्वदेशी और टिकाऊ पेंट के बजाय महंगे कैमिकलयुक्त पेटो को खरीदा जा रहे हैं। इतने फायदा और कम कीमत के बावजूद निगम अधिकारियों का इससे परहेज करना उनकी मंशा पर भारी सवाल खड़े कर रहा है।

निगम ने झाड़ा पल्ला

इस मामले में निगम अधिकारियों का कहना है कि प्लांट से पेंट खरीदने की प्रक्रिया चल रही है। टेंडर और गुणवत्ता जांच जैसे मानक पूरे किये जा रहे हैं। कोशिश है कि जल्द से जल्द निगम के समस्त कामों में इस पेंट का इस्तेमाल शुरू हो। मुख्यालय की पुताई के लिए जापानी और अन्य कंपनियों के पेंट के इस्तेमाल पर उनका कहना है कि यह ठेकेदार द्वारा किया जा रहा है। इस काम के लिए ठेकेदार ने ही पेंट खरीदा है।

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