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वादे से वोट तक सीमित सिस्टम: निलाया ग्रीन-हम तुम रोड पर कार्रवाई कब? और कितनी जान जाने का इंतजार कर रहा सरकारी तंत्र
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गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन की निलाया ग्रीन-हम तुम रोड आज सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही की पहचान बन चुकी है। हजारों परिवार रोज इसी रास्ते से निकलते हैं, लेकिन न सुरक्षा है, न सुविधा। ये सड़क कई जाने लील चुकी है लेकिन ना प्रशासन की आँखे खुली और ना ही जन प्रतिनिधियों की। अब इलाके के लोगों की जुबान पर एक ही सवाल है कि आखिर यहां की सुध कब और कौन लेगा?
हजारों परिवारों की मजबूरी
दिया ग्रीन, निलाया ग्रीन, महाकजीवन, राज विला, संचार, मिडोज और मोती जैसी सात बड़ी सोसायटियों के बीच से गुजरने वाली यह सड़क हजारों लोगों की रोजमर्रा की जरूरत है। हर टावर में सैकड़ों परिवार रहते हैं, लेकिन सड़क की हालत ऐसी है कि पैदल चलना तक जोखिम भरा हो गया है। न सड़क चौड़ी है, न फुटपाथ, और रात होते ही अंधेरा डर पैदा कर देता है।
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| सरकारी लापरवाही की भेंट चढ़ा युवक और नाराज लोग |
संकरी सड़क, भारी खतरा
हम तुम रोड पर भारी वाहनों की आवाजाही बिना किसी नियंत्रण के जारी है। स्कूलों के पास न स्पीड ब्रेकर हैं, न चेतावनी बोर्ड। सड़क जर्जर है और जगह-जगह गड्ढे हादसों को न्योता देते हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि घर से निकलते वक्त मन में यही डर रहता है कि सही-सलामत वापस लौट पाएंगे या नहीं।
चार साल में 16 मौतें
स्थानीय निवासियों के अनुसार, पिछले चार वर्षों में इस सड़क पर 16 लोगों की जान जा चुकी है। हाल ही में निलाया ग्रीन निवासी मोहित शर्मा की मौत ने एक बार फिर सिस्टम की पोल खोल दी। इससे पहले 2 फरवरी को स्कूटी सवार तृप्ति के ट्रक की चपेट में आने की घटना भी प्रशासन के लिए चेतावनी थी, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
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| प्रदर्शन करते हम तुम रोड निवासी |
मांगें बहुत, कार्रवाई शून्य
निवासियों ने कई बार सड़क चौड़ीकरण, डिवाइडर, स्ट्रीट लाइट और भारी वाहनों पर रोक की मांग की। धरना-प्रदर्शन हुए, ज्ञापन दिए गए, अधिकारियों से मुलाकात भी हुई, लेकिन नतीजा आज तक शून्य है। लोगों का आरोप है कि जीडीए सिर्फ बैठकों और फाइलों तक सीमित रह गया है।
नोटिस के बाद भी सन्नाटा
मानवाधिकार आयोग द्वारा जीडीए को नोटिस दिए जाने के बाद भी हालात जस के तस हैं। न अस्थायी सुरक्षा इंतजाम हुए, न ट्रैफिक व्यवस्था सुधरी। आज राजनगर एक्सटेंशन के हर निवासी, खासकर हमतुम रोड पर बसी सोसायटियों के लोगों की जबान पर बस यही सवाल है कि प्रशासन, जीडीए और जनप्रतिनिधि आखिर कब जागेंगे?
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