गाजियाबाद। अगर आपका बच्चा तीन साल से छोटा है और आप उसे साथ लेकर रैपिड ट्रेन में सफर करना चाहते हैं तो घर से निकलने से पहले उसकी हाइट जरूर नाप लें। क्योंकि अगर उसकी हाइट 90 सेंटीमीटर से ऊपर हुई तो आप उसकी फ्री यात्रा की सोच को निकाल बाहर फेंकिए। आपको उसका भी पूरा टिकट लेना पड़ेगा। ऐसे में आपकी जेब ज्यादा ढीली करनी पड़ेगी।
ऐसा ही कुछ हुआ है राजनगर एक्सटेंशन की मिडोज विस्ता सोसायटी की रहने वाली प्राची मिश्रा के साथ। दरअसल उन्हें मेरठ जाना था तो वो एनसीआरटीसी के गुलधर स्टेशन पर अपने ढाई साल के बेटे के साथ पहुंची। लेकिन वो वहां पहुंचकर उस वक्त हैरान रह गईं जब उनसे कहा गया कि उनके बेटे का पूरा टिकट लगेगा। कारण पूछने पर बताया गया कि पहले बच्चे की हाइट नापी जाएगी। हाइट नापने पर उनका बेटा 90 सेंटीमीटर से थोड़ा सा ज्यादा निकला। जिस पर उन्हें उसका भी 120 रुपये का पूरा टिकट लेकर सफर करना पड़ा।
अभिभावक बड़े परेशान
ऐसा अकेले प्राची मिश्रा के साथ नहीं हुआ है। रोजाना बड़ी संख्या में रैपिड ट्रेन से सफर करने वाले माता-पिता को इस दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। खासतौर पर छोटे बच्चों के साथ यात्रा करने वालों के लिए यह नियम परेशानी का कारण बनता जा रहा है।
हाइट आधारित नियम बना उलझन
एनसीआरटीसी की नमो भारत रैपिड ट्रेन में बच्चों के लिए उम्र नहीं, बल्कि हाइट के आधार पर किराया तय किया गया है। 90 सेंटीमीटर तक के बच्चे फ्री माने जाते हैं, जबकि इससे ऊपर होते ही पूरा टिकट देना पड़ता है। यहीं से भ्रम शुरू होता है, क्योंकि 2–3 साल के कई बच्चे भी इस हाइट को पार कर जाते हैं।
उम्र कम, किराया ज्यादा
माता-पिता का कहना है कि इतनी छोटी उम्र के बच्चों पर पूरा किराया लागू करना व्यावहारिक नहीं है। कई मामलों में बच्चा गोद में होता है, सीट भी अलग से नहीं लेता, फिर भी पूरा किराया देना पड़ता है। इससे यात्रा खर्च अचानक बढ़ जाता है।
स्टेशन पर होती है असहज स्थिति
यात्रा के दौरान सबसे ज्यादा दिक्कत तब होती है जब स्टेशन पर अचानक हाइट चेक की जाती है। कई बार अभिभावकों को वहीं टिकट लेना पड़ता है, जिससे असहज स्थिति बनती है और बहस तक हो जाती है। कुछ लोग तो इस वजह से यात्रा टालने तक की बात कह रहे हैं।
नीति पर उठ रहे सवाल
प्राची मिश्रा का कहना है कि रेलवे की तरह उम्र आधारित या कम से कम “हाफ टिकट” का विकल्प होना चाहिए। केवल हाइट के आधार पर नियम लागू करने से छोटे बच्चों के अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
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