ओरा कायमेरा: डीआर के ऑडिट के आदेश ठेंगे पर, समय सीमा बीती पर आज तक भी शुरू नहीं.... एओए आरोपों के घेरे में

विभु मिश्रा 
गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन स्थित ओरा कायमेरा सोसायटी में एओए की कार्यप्रणाली अब सीधे प्रशासन के निशाने पर आ गई है। डिप्टी रजिस्ट्रार द्वारा चार्टर्ड अकाउंटेंट नियुक्त कर चार सप्ताह में जांच पूरी करने के आदेश दिए गए थे, लेकिन करीब एक महीना बीत जाने के बाद भी न तो ऑडिट शुरू कराया गया और न ही कोई रिपोर्ट सामने आई। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि एओए न सिर्फ नियमों की अनदेखी कर रही है, बल्कि जांच प्रक्रिया को भी टालने की कोशिश में है।

शिकायतों की लंबी सूची

सोसायटी के निवासियों की शिकायतों का सिलसिला पिछले साल नवंबर से लगातार जारी है। 17 नवंबर 2025 को राहुल त्यागी ने लिखित शिकायत में आरोप लगाया कि एओए द्वारा न तो नियमों के अनुसार चुनाव कराए जा रहे हैं और न ही मेंटेनेंस व अन्य मदों में वसूली गई रकम का कोई सार्वजनिक हिसाब दिया जा रहा है। इसके कुछ ही दिन बाद 21 नवंबर 2025 को संजय मिश्रा ने भी शिकायत दर्ज कराते हुए कहा कि कई वर्षों से सोसायटी में कोई बैलेंस शीट, आय-व्यय का ब्योरा, ऑडिट रिपोर्ट या भुगतान का रिकॉर्ड साझा नहीं किया गया है। 20 दिसंबर 2025 को अंकुर कुमार त्यागी ने भी मेंटेनेंस शुल्क के संग्रह और खर्च में गंभीर गड़बड़ियों की आशंका जताई, जिससे मामला और गहरा गया।

तीन साल से चुनाव नहीं

शिकायतों में यह भी सामने आया कि वर्ष 2022 से 2025 तक सोसायटी में करोड़ों रुपये का लेनदेन हुआ, लेकिन एक बार भी ऑडिट नहीं कराया गया। तीन साल से एक ही एओए बनी हुई है और केवल एक बार चुनाव कराए गए, उसके बाद से अब तक कोई चुनाव नहीं हुआ। निवासियों का कहना है कि किरायेदारों से हर महीने अतिरिक्त राशि वसूली गई और अलग-अलग कार्यक्रमों के नाम पर दो हजार से पांच हजार रुपये तक लिए गए, लेकिन इन पैसों का कोई हिसाब सार्वजनिक नहीं किया गया।

डिप्टी रजिस्ट्रार का आदेश

मामले की गंभीरता को देखते हुए 10 दिसंबर 2025 को डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय ने एओए को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था और स्पष्ट किया था कि सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 की धारा 24 के तहत जांच की कार्रवाई शुरू की जा सकती है। इसके बाद 25 फरवरी 2026 को चार्टर्ड अकाउंटेंट दीपक मित्तल को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया, जिन्हें 2022-23 से अब तक के सभी वित्तीय रिकॉर्ड, बैंक खाते और संपत्तियों की जांच कर चार सप्ताह में रिपोर्ट देने के आदेश दिए गए।

आदेशों की खुली अनदेखी

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि आदेश जारी होने के करीब एक महीना बीत जाने के बाद भी एओए ने जांच शुरू कराने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। न तो जांच अधिकारी को जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराए गए और न ही ऑडिट प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। इससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर एओए क्या छिपाना चाहती है और क्यों प्रशासन के आदेशों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है। अब निगाहें इस बात पर टिक गई हैं कि क्या आगे सख्त कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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