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गाजियाबाद। इंदिरापुरम स्थित कृष्णा अपरा गार्डन्स के यूपी अपार्टमेंट एक्ट को दरकिनार करते हुए कराए गए एओए चुनाव में मौन एक्सप्रेस की खबरों का साफ असर देखने को मिला। एओए की खामियों को लगातार उजागर कर सोसायटी वासियों के बीच लगातार पहुंचने का असर ये हुए कि पिछली बार सत्ता में रही टीम केएजी का इस चुनाव में पूरी तरह सफाया हो गया, जबकि नई टीम ‘समन्वय’ ने सभी 10 सीटों पर कब्जा जमाते हुए एकतरफा जीत दर्ज की।
समन्वय टीम की क्लीन स्वीप जीत
चुनाव परिणामों के अनुसार ‘समन्वय’ टीम के सभी 10 प्रत्याशी जीतकर गवर्निंग बॉडी में पहुंचे। वोट प्रतिशत के हिसाब से विजेताओं की स्थिति इस प्रकार रही:- अनिल कुमार (279 वोट, 20.5%), रजनीश कुमार (278 वोट, 20.4%), सुशील कुमार सिंघल (271 वोट, 19.9%), रोहित चंद्रा (268 वोट, 19.6%), विक्रम सिंह (255 वोट, 18.7%), स्पंदन सिंह (255 वोट, 18.7%), हिमांशु शुक्ला (256 वोट, 18.8%), के एल माली (250 वोट, 18.3%), कमलजीत सिंह (243 वोट, 17.8%) और राजीव मंडल (238 वोट, 17.4%) ने जीत दर्ज की।
केएजी के सभी उम्मीदवार हारे
वहीं टीम केएजी के सभी प्रत्याशी चुनाव हार गए। हारने वाले उम्मीदवारों में पूर्व अध्यक्ष तजिंदर सिंह (147 वोट, 10.8%), मृदुल कुमार अग्रवाल (129 वोट, 9.5%), हृदयेश वर्श्नेय (129 वोट, 9.5%), बलबीर सिंह (118 वोट, 8.6%), प्रीति शर्मा (118 वोट, 8.6%), गीतू अग्रवाल (117 वोट, 8.6%), नीरव कुमार (116 वोट, 8.5%), ब्रतिन भट्टाचार्य (118 वोट, 8.6%), चिराग कटारिया (109 वोट, 8.0%) और कपिल गुप्ता (104 वोट, 7.6%) शामिल रहे।
हार के पीछे उठे बड़े मुद्दे
निवासियों के बीच इस बार चुनावी माहौल पूरी तरह मुद्दों पर केंद्रित रहा। इन मुद्दों को पिछले काफी समय से मौन एक्सप्रेस लगातार उठा रहा था। सबसे ज्यादा चर्चा डॉल्फिन कंपनी को दिए गए सिविल और फील्ड कार्यों को लेकर रही, जिस पर पारदर्शिता न बरतने के आरोप लगे। इस कंपनी का सोसायटीवासियों के सामने खुलासा भी मौन एक्सप्रेस ने ही किया था। इसके अलावा आरडब्ल्यूए की कार्यशैली, जवाबदेही की कमी को लेकर भी लोगों में नाराजगी रही। कई रेजिडेंट्स ने आरोप लगाया कि महत्वपूर्ण मुद्दों को प्राथमिकता नहीं दी गई, जिससे असंतोष लगातार बढ़ता गया।
मेंटेनेंस और वित्तीय सवाल भारी पड़े
गर्मी के सीजन में स्विमिंग पूल क्षेत्र में मरम्मत कार्य शुरू कर देना भी निवासियों को भारी पड़ा, क्योंकि पूरा सीजन प्रभावित हुआ। वहीं वित्तीय पारदर्शिता को लेकर भी गंभीर सवाल उठे। रेजिडेंट्स का कहना है कि आय-व्यय का स्पष्ट और समय पर विवरण साझा नहीं किया गया, जिससे भरोसा कमजोर हुआ और यही चुनावी नतीजों में बड़ा फैक्टर बन गया।
मतदान के दिन भी विवाद
जानकारी के अनुसार चुनाव के दिन भी विवादों ने माहौल गरमाए रखा। आरोप है कि एक चुनाव अधिकारी ने एक महिला समेत कई को-ऑनर मतदाताओं के साथ अभद्र व्यवहार किया और फ्लैट ऑनर की गैरमौजूदगी में उन्हें वोट डालने से रोका। इस घटना को लेकर सोसायटी में खासा आक्रोश देखने को मिला।
अपात्र उम्मीदवार को लड़ाया चुनाव
हैरत इस बात की रही कि चुनाव अधिकारियों ने एक ऐसे प्रत्याशी को चुनाव लड़ने की परमिशन दे दी जो फ्लैट ऑनर नहीं बल्कि को-ऑनर हैं। और तो और इन पर इतनी मेहरबानी भी की गई कि इन्हें फ्लैट ऑनर के रूप में कागजों में नाम दर्ज कराने के लिए दो महीने का समय भी दे दिया। जबकि कई को-ऑनर वोटर्स को वोट डालने से रोक दिया गया। इसको लेकर भी सोसायटी में माहौल गर्म है।
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