गाजियाबाद का बम्हैटा गांव, जहां की मिट्टी में आज भी महकती है अखाड़ों की शान

विभु मिश्रा
गाजियाबाद। दिल्ली से सटे गाजियाबाद के नेशनल हाईवे-9 के किनारे बसा शाहपुर बम्हैटा गांव आज गगनचुंबी सोसायटियों और कंक्रीट के जंगलों से घिर चुका है, लेकिन इस आधुनिकता के बीच भी इस गांव ने अपनी सदियों पुरानी पहचान को बखूबी जिंदा रखा है। इस गांव को किसी मॉल या चौड़ी सड़कों की वजह से नहीं, बल्कि पहलवानों के गढ़ के रूप में जाना जाता है। बम्हैटा के बारे में कहा जाता है कि यहां की हवा में कुश्ती की महक है और यहां के हर दूसरे घर से एक पहलवान निकलता है।

बकरी और भेड़िए की कहानी

बम्हैटा गांव का इतिहास करीब 10वीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है। गांव के बुजुर्गों के मुताबिक सदियों पहले जब यदुवंशी राजाओं का एक काफिला इस इलाके से गुजर रहा था, तब उन्होंने एक ऐसा दृश्य देखा जिसने इस जगह की पहचान तय कर दी। बताया जाता है कि एक भेड़िए ने बकरी के बच्चे पर हमला कर दिया था, लेकिन बकरी ने डरने के बजाय भेड़िए से भिड़कर उसे वहां से भगा दिया। इस घटना को देखकर काफिले के बुजुर्गों ने कहा कि जिस मिट्टी का तिनका खाकर एक बकरी में इतनी ताकत आ सकती है, वह जमीन साधारण नहीं हो सकती। इसके बाद इस स्थान का नाम ‘मर्द खेड़ा’ रखा गया, जो समय के साथ बदलकर बम्हैटा कहलाने लगा। गांव के लोगों का मानना है कि इसी मिट्टी की ताकत ने यहां पहलवानी की परंपरा को जन्म दिया।

प्रधानों का बड़ा कुनबा

करीब 25 हजार की आबादी वाले बम्हैटा गांव में सबसे ज्यादा संख्या यादव समाज की है। यहां प्रधानों का परिवार सबसे बड़ा और प्रभावशाली माना जाता रहा है। पुराने समय में इस परिवार के पास काफी जमीनें थीं और गांव की सामाजिक व्यवस्था में इनकी मजबूत पकड़ रही। गांव में आज भी 18वीं शताब्दी में कुंवर हमीर सिंह यादव द्वारा बनवाई गई ‘खेड़े वाली हवेली’ के अवशेष मौजूद हैं, जो गांव के पुराने जमींदारी इतिहास और रसूख की कहानी बयां करते हैं।

इसी परिवार से जुड़े सौरभ यादव बताते हैं कि बम्हैटा का इतिहास काफी पुराना और गौरवशाली रहा है। उनके मुताबिक पहले गांव में प्रधानी व्यवस्था का काफी प्रभाव था, लेकिन अब बम्हैटा नगर निगम क्षेत्र में शामिल हो चुका है, इसलिए व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी पार्षद के हाथ में रहती है। उन्होंने कहा कि गांव में यादव समाज के अलावा दूसरी जातियों के लोग भी रहते हैं और सभी आपसी भाईचारे के साथ जीवन बिताते हैं। सौरभ यादव का कहना है कि यहां बच्चे के जन्म के बाद उसे अखाड़े की मिट्टी से परिचित कराया जाता है, क्योंकि गांव में कुश्ती केवल खेल नहीं बल्कि परंपरा और संस्कार का हिस्सा मानी जाती है।

गांव में 12 अखाड़े सक्रिय

बम्हैटा गांव की पहचान सबसे ज्यादा उसके अखाड़ों से है। गांव में कुल 12 छोटे-बड़े अखाड़े सक्रिय हैं, जहां रोज सुबह और शाम युवाओं की भीड़ नजर आती है। पानी की टंकी के पास स्थित पुराना अखाड़ा और गुरु भीम अखाड़ा गांव के सबसे चर्चित अखाड़ों में गिने जाते हैं। इसके अलावा गांव का सबसे बड़ा केंद्र ‘कुश्ती अखाड़ा बम्हेटा स्टेडियम’ है, जो करीब आठ एकड़ में फैला हुआ है।

विजयपाल पहलवान
इस स्टेडियम का जीर्णोद्धार उस समय कराया गया था जब संतोष यादव जीडीए के उपाध्यक्ष थे। अब यहां आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं और पारंपरिक मिट्टी के साथ मैट पर भी अभ्यास कराया जाता है। स्टेडियम के संचालक विजयपाल पहलवान बताते हैं कि इस अखाड़े ने जिले से लेकर एशिया स्तर तक के पहलवान तैयार किए हैं। उन्होंने खुद राष्ट्रीय स्तर तक कुश्ती लड़ी है। विजयपाल पहलवान के मुताबिक वर्तमान में उनके अखाड़े में करीब सौ बच्चे और युवा नियमित रूप से कुश्ती के दांव-पेंच सीख रहे हैं।

पहलवान बनने का खर्चा

कोच प्रिंस पाण्डेय
कोच प्रिंस पाण्डेय का कहना है कि एक अच्छा पहलवान तैयार करने में कम से कम दस साल का समय लगता है। उन्होंने बताया कि पहलवानी केवल ताकत का खेल नहीं बल्कि अनुशासन, मेहनत और महंगे खानपान का भी खेल है। उनके मुताबिक एक पहलवान की ट्रेनिंग और डाइट पर हर महीने कम से कम 30 हजार रुपये तक खर्च आता है। इसमें दूध, दही, बादाम, देसी घी, प्रोटीन और अन्य पौष्टिक चीजें शामिल होती हैं। गांव के कई परिवार आज भी अपने बच्चों की पहलवानी के लिए इसी तरह का खर्च उठा रहे हैं ताकि उनकी परंपरा जिंदा रह सके।

देशभर में गूंजा नाम

शाम होते ही बम्हैटा के अखाड़ों में ‘जय बजरंगबली’ के नारों के साथ युवा मिट्टी में पसीना बहाते दिखाई देते हैं। गांव के दंगलों की पहचान इतनी बड़ी रही है कि देश के दिग्गज पहलवान और ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त भी यहां आकर कुश्ती लड़ चुके हैं और अभ्यास कर चुके हैं। बम्हैटा की मिट्टी ने अब तक 60 से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान देश को दिए हैं। गाजियाबाद का नाम अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में सबसे पहले पहचान दिलाने वाले पहलवान जगदीश पहलवान माने जाते हैं। उन्होंने 1950 के दशक में लगातार चार साल तक नेशनल चैंपियन रहकर गांव और जिले का नाम रोशन किया। उनके बाद लाला पहलवान, सत्तन पहलवान, कप्तान पहलवान और यश भारती व यूपी केसरी सम्मान से सम्मानित कोच विजयपाल पहलवान जैसे नामों ने बम्हैटा को देशभर में पहचान दिलाई।

नई पीढ़ी संभाल रही विरासत

राजेश पहलवान
जगदीश पहलवान के भतीजे राजेश पहलवान आज गांव में ‘जगदीश कुश्ती एकेडमी’ चला रहे हैं। उनका कहना है कि नई पीढ़ी भी गांव की इस परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। हालांकि समय के साथ परिस्थितियां बदली हैं और अब अभिभावक बच्चों को शिक्षा और टेक्निकल कोर्स की तरफ ज्यादा भेजना चाहते हैं। इसके बावजूद गांव के युवाओं में कुश्ती का जुनून कम नहीं हुआ है। हाल ही में गांव के 15 वर्षीय कार्तिक यादव ने एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर यह साबित किया कि बम्हैटा की मिट्टी में आज भी वही ताकत और हुनर मौजूद है, जिसने दशकों तक देश को बड़े पहलवान दिए।

शहरीकरण के बीच पहचान कायम

गाजियाबाद में तेजी से हुए शहरीकरण का असर अब बम्हैटा गांव पर भी साफ दिखाई देता है। गांव की ज्यादातर खेती की जमीन वेव सिटी परियोजना के लिए बिल्डरों द्वारा किसानों से एक्वायर कर ली गई है। इसके चलते गांव के चारों तरफ अब ऊंची-ऊंची इमारतें और बड़ी सोसायटियां खड़ी हो चुकी हैं। इसके बावजूद गांव के युवाओं का कुश्ती के प्रति लगाव कम नहीं हुआ है। अब यहां के पहलवान पारंपरिक मिट्टी के अखाड़ों के साथ-साथ आधुनिक मैट पर भी ट्रेनिंग ले रहे हैं। गांव के कई युवा कुश्ती को अब केवल शौक नहीं बल्कि करियर के रूप में देख रहे हैं। स्पोर्ट्स कोटे के जरिए यहां के पहलवान रेलवे, पुलिस और सेना जैसी सरकारी नौकरियों में पहुंचकर देश सेवा कर रहे हैं। 

आधुनिकता और संस्कृति

आधुनिकता और बदलते दौर के बावजूद बम्हैटा गांव आज भी अपनी खेल संस्कृति और अखाड़ों की परंपरा को उसी गर्व के साथ जिंदा रखे हुए है, जिसके लिए उसे पूरे गाजियाबाद में अलग पहचान हासिल है।

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