"एक साल का कार्यकाल फिर भी कुर्सी बरकरार", अपार्टमेंट सोसाइटियों के चुनाव पर हाई कोर्ट सख्त

विभु मिश्रा 
गाजियाबाद। उत्तर प्रदेश की ग्रुप हाउसिंग सोसाइटियों में पदाधिकारियों के लंबे समय तक पद पर बने रहने और सदस्यों को मतदान से दूर रखने के मामलों पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने नियमों में मौजूद विरोधाभास और उसके संभावित दुरुपयोग पर राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। साथ ही गाजियाबाद की सभी ग्रुप हाउसिंग सोसाइटियों में अदालत के आदेश की प्रति नोटिस बोर्ड पर लगाने के निर्देश दिए हैं।

चुनाव टालने पर सवाल

मामला एल्डिको आमंत्रण अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन की ओर से दाखिल याचिका से जुड़ा है। याचिका में गाजियाबाद के उप रजिस्ट्रार, फर्म्स, सोसाइटीज एंड चिट्स के 20 अप्रैल 2026 के आदेश को चुनौती दी गई थी। इस आदेश में नए प्रबंध बोर्ड के गठन तक मौजूदा पदाधिकारियों की वित्तीय शक्तियों को केवल दैनिक खर्चों तक सीमित किया गया था। याचिकाकर्ता ने कोर्ट में कहा कि सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 में पदाधिकारियों की किसी सूची को अनंतिम मंजूरी देने का प्रावधान नहीं है। इसलिए उप रजिस्ट्रार का आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर और शुरू से ही शून्य है। याचिका में यह भी बताया गया कि 29 मार्च 2026 को चुनाव हुआ था, लेकिन चुनाव प्रक्रिया पूरी नहीं हुई और नतीजे घोषित नहीं किए गए।

नियमों में विरोधाभास

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट (निर्माण, स्वामित्व एवं रखरखाव संवर्धन) नियमावली, 2011 के मॉडल उपविधि 26 के उपखंड (ii) और (iii) को पहली नजर में विरोधाभासी पाया। अदालत ने गौर किया कि एक प्रावधान में पदाधिकारी का कार्यकाल एक साल तय किया गया है, जबकि दूसरे प्रावधान में नए चुनाव होने तक पुराने पदाधिकारियों को पद पर बने रहने की अनुमति मिलती है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी व्यवस्था का फायदा उठाकर प्रबंधन चुनाव टाल सकता है और पदाधिकारी वर्षों तक अपनी कुर्सी पर बने रह सकते हैं। अदालत के अनुसार इससे प्रबंधन में मनमानी बढ़ने, जवाबदेही खत्म होने और वित्तीय अनियमितताओं की आशंका पैदा होती है।

वोटिंग अधिकार पर नाराजगी

हाई कोर्ट ने सदस्यों के मतदान अधिकार को लेकर भी गंभीर चिंता जताई। अदालत के सामने यह मुद्दा आया कि सोसाइटियों में रखरखाव शुल्क या बिजली बिल बकाया होने का हवाला देकर सदस्यों को मतदान से बाहर कर दिया जाता है। कोर्ट ने कहा कि इस तरीके से प्रबंध बोर्ड अपनी सुविधा के अनुसार चुनिंदा लोगों को मतदाता सूची में रख सकता है। अदालत ने इसे गंभीर विषय माना, क्योंकि इससे सोसाइटी चुनाव की निष्पक्षता और सदस्यों के अधिकार सीधे प्रभावित हो सकते हैं। कोर्ट ने इस पूरे मामले पर राज्य सरकार से स्थिति स्पष्ट करने के लिए जवाब मांगा है।

आदेश पर लगाई रोक

अदालत ने उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (संस्थागत वित्त) और रजिस्ट्रार, फर्म्स, सोसाइटीज एंड चिट्स को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही आदेश की प्रति गाजियाबाद की सभी ग्रुप हाउसिंग सोसाइटियों के नोटिस बोर्ड पर चस्पा करने को कहा है, ताकि सदस्य, प्रबंध बोर्ड और अन्य संबंधित लोग अपने सुझाव सीधे हाई कोर्ट के सामने रख सकें। कोर्ट ने 20 अप्रैल 2026 के विवादित आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक भी लगा दी है। मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर 2026 को होगी।

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