एनसीआर की बिगड़ी हवा के बीच बच्चों का ‘ग्रीन रावण’, वेस्ट से पुतला बनाकर दिया बड़ा संदेश

मौन एक्सप्रेस डेस्क
गाजियाबाद। विजयादशमी पर रावण दहन की परंपरा हर जगह उत्साह के साथ निभाई गई, लेकिन क्रॉसिंग्स रिपब्लिक की गार्डिनिया स्क्वायर सोसाइटी में बच्चों ने इसे अपने अनूठे अंदाज में मनाया। बच्चों ने घरों में पड़े अनुपयोगी सामान और वेस्ट मटीरियल को जुटाकर रावण का पुतला तैयार किया। इसके बाद बच्चों ने उसी पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मनाया। बच्चों की इस पहल ने त्योहार की परंपरा के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी जोड़ दिया।

वेस्ट से तैयार किया रावण

गार्डिनिया स्क्वायर के बच्चों ने रावण का पुतला बनाने के लिए नए सामान की जगह घरों में मौजूद अनुपयोगी वस्तुओं का इस्तेमाल किया। बच्चों ने अपनी कल्पना और रचनात्मकता से इन चीजों को रावण का रूप दिया। दस सिर वाले इस रंग-बिरंगे रावण को तैयार करने में बच्चों ने मिलकर मेहनत की। उनकी कोशिश थी कि बेकार समझे जाने वाले सामान को दोबारा उपयोग में लाकर त्योहार की खुशी को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी से जोड़ा जाए।

बच्चों ने किया रावण दहन

पुतला तैयार होने के बाद सोसाइटी परिसर में बच्चों और अभिभावकों की मौजूदगी में रावण दहन किया गया। बच्चे पूरे उत्साह के साथ दहन कार्यक्रम में शामिल हुए। उनके लिए यह सिर्फ रावण जलाने का आयोजन नहीं था, बल्कि अपनी बनाई चीज को समाज के सामने रखने का अवसर भी था। सोसाइटी के निवासियों ने बच्चों के प्रयास की सराहना की और उनकी सोच को नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक बताया।

प्रदूषण के बीच बड़ी सीख

विजयादशमी के बाद एनसीआर में रावण के पुतलों के दहन से प्रदूषण का स्तर बढ़ने को लेकर चिंता सामने आई। ऐसे समय में बच्चों की यह पहल पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का उदाहरण बनकर सामने आई। बच्चों ने यह संदेश दिया कि परंपराओं को छोड़ने की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी के साथ निभाया जा सकता है। गार्डिनिया स्क्वायर के बच्चों का ‘ग्रीन रावण’ इसी सोच की मिसाल बना।

नई पीढ़ी की पहल

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में बच्चे, अभिभावक और सोसाइटी के निवासी मौजूद रहे। बच्चों के उत्साह और रचनात्मकता ने कार्यक्रम को खास बना दिया। इस पहल ने समाज को यह सीख दी कि पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत छोटे-छोटे प्रयासों से हो सकती है। बच्चों ने अपने काम से दिखाया कि त्योहार की खुशी, परंपरा और प्रकृति की चिंता तीनों को एक साथ लेकर चला जा सकता है।

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